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कृष्ण को महाभारत युद्ध का दोषी ठहराकर मुनिवर श्राप देने लगे

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महाभारत युद्ध को इस समय में भी जब कोई याद करता है उसके बारे में जानकर सभी के रोंगटे खड़े हो जाते है. महाभारत का युद्ध भाइयो के बीच हुआ था जहाँ पर पुरे कुरुक्षेत्र में खून की नदियाँ बहाई गयी थी. युद्ध जीत जाने के बाद भी पांडव उदास थे क्योंकि वे अपने भाइयो रिश्तदारो सभी को खो चुके थे. भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध में पांड्वो का साथ दिया था. इसलिए एक मुनिवर ने श्रीकृष्ण को युद्ध का दोषी बताते हुए उन्हें श्राप दिया था. इसपर भगवान श्रीकृष्ण कहते है मैंने इस युद्ध को रोकने का बहुत प्रयास किया लेकिन मैं विधि के विधान का उलंघन नही करना चाहता था. आप एक तपस्वी है और आपका इस तरह से मुझे श्राप देने से आपका तपोवल शून्य हो जायेगा.

कृष्ण की बाते सुनकर भी मुनिवर नही माने और कहने लगे कृष्ण तुम अपनी बातो से मुझे श्राप से बचने की कोशिश कर रहे हो. इसपर कृष्ण ने कहा कि मैं श्राप, काल से परे हूँ. किसी भी श्राप का प्रभाव मेरा कुछ नही बिगाड़ सकता है. श्राप मुझे नही लगता लेकिन मैं तपस्वियों के तपोवल का आदर करता हूँ. इसलिए इनके वचनों को मैं ही सत्य का रूप देता हूँ. अर्थात इनके श्राप मेरे ही कारण सत्य होते है. क्योंकि अधर्म में लगे हुए सभी मनुष्यों को दंड देने वाला और अपनी मर्यादा से कभी चुक न होने वाला ईश्वर मैं ही हूँ.  मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा मैं ही इंद्र हूँ.

आगे कृष्ण ने कहा संपूर्ण भूतो की उत्पति और प्रलय का कारण भी मैं ही हूँ. जब धरती पर अधर्म होता है तो मैं ही धर्म की स्थापना के लिए भिन्न भिन्न श्रेणियों में अवतार लेकर धर्म मर्यादा की स्थापना करता हूँ. हे महात्मा अगर ये युद्ध नही होता तो पृथ्वी पर पापो का बोझ बढ़ जाता. धर्मात्माओं के साथ धर्म भी काराग्रह में बंदी बन जाता. हर तरफ अधर्म ही अधर्म होता और आप जैसे तपस्वियों का आदर सत्कार की जगह उनका तिरस्कार किया जाता. मैंने धर्म की स्थापना के लिए और अधर्मियों का नाश करने के लिए तो ये अवतार धारण किया है. ये सब सुनकर मुनिवर की आँखे भर आई और वे कहने लगे भक्त अपने भगवान को श्राप देते है ऐसा कहकर वे भगवान कृष्ण के पैरो में गिर पड़े और माफ़ी मांगने लगे.

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