धारा 370 :- स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु का ये राज आजतक देश की जनता नहीं जानती

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धारा 370 :- स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु का ये राज आजतक देश की जनता नहीं जानती

कोलकाता में देश के कई महानायकों ने जन्म लिया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनमें से ही एक खास नाम थे। वही श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने ‘भारतीय जनसंघ’ की नींव रखी, जो बाद में भाजपा बनी और जिसकी केंद्र में सरकार है।

यह वही व्यक्ति थे जिन्हें कश्मीर में कदम रखते ही जेल में डाल दिया गया। 6 जुलाई 1901 मेें जन्मे इस नायक ने अपनी राजनीति से विरोधियों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। वह तेजी से राजनीति की सीढ़ियों को चढ़ रहे थे, तभी अचानक 23 जून 1953 को उनकी मौत की खबर ने सभी को हैरान कर दिया। तो आईये इससे जुड़े कुछ पहलुओं को जानने की कोशिश करते हैं।
1947 में जैसे ही देश आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरु ने एक नई सरकार बनाई। इस सरकार में उन्हें उद्योग और आपूर्ति विभाग की जिम्मेदारी दी गई। बेहतरीन कार्यकाल के बावजूद मुखर्जी को कई चीजें लगातार परेशान कर रहीं थी। नेहरु उन्हें लगातार कम आंकते थे, जो उन्हें खटकने लगा था।
इसी बीच 1950 के आसपास ईस्ट पाकिस्तान में हिन्दुओं पर जानलेवा हमले शुरु हो गये। करीब 50 लाख हिन्दू ईस्ट पाकिस्तान को छोड़ भारत वापस आ गए। हिन्दुओं की यह हालत देखकर मुखर्जी चाहते थे कि देश पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदम उठाए। वह कुछ कहते इससे पहले जवाहरलाल नेहरु और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने समझौता कर लिया था।

समझौते के मुताबिक दोनों देश के रिफ्यूजी बिना किसी परेशानी के अपने-अपने देश आ जा सकते थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नेहरु जी की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई. उन्होंने तुरंत ही कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफ़ा देते ही उन्होंने रिफ्यूजी की मदद के काम में खुद को झोंक दिया।

1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘भारतीय जनसंघ‘ नाम की एक पार्टी का गठन किया। इसके गठन के पीछे एक ही वजह थी निजी स्वतंत्रता। वह किसी के दवाब में नहीं रहना चाहते थे। पार्टी के गठन के बाद उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस की हर एक उस नीति का उन्होंने विरोध किया, जो देशहित में नहीं थी।

इसी कड़ी में 1953 में जब कुछ कारणों की वजह से जवाहरलाल नेहरु ने कश्मीर को एक अलग राज्य बनाने का मन बना डाला। मुखर्जी को यह बात बिल्कुल रास नहीं आई। उनका मानना था कि भारत में यह एकता भंग करने वाला काम है। उन्होंने आर्टिकल 370 का बहिष्कार शुरु कर दिया। सड़क से लेकर सदन तक उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई।

दुर्भाग्यवश उनकी नहीं चली और आख़िरकार कश्मीर को अलग कर दिया गया। उसे अपना एक नया झंडा और नई सरकार दे दी गई। एक नया कानून भी जिसके तहत कोई दूसरे राज्य का व्यक्ति वहां जाकर नहीं बस सकता। सब कुछ खत्म हो चुका था, लेकिन मुखर्जी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे। ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ के नारे के साथ वह कश्मीर के लिए निकल पड़े।

नेहरु को इस बात की खबर हुई तो उन्होंने हर हाल में मुखर्जी को रोकने का आदेश जारी कर दिया। उन्हें कश्मीर जाने की इजाजत नहीं थी। ऐसे में मुखर्जी के पास गुप्त तरीके से कश्मीर पहुंचने के सिवा कोई दूसरा विकल्प न था। वह कश्मीर पहुंचने में सफल भी रहे, मगर उन्हें पहले कदम पर ही पकड़ लिया गया। उन पर बिना इजाजत कश्मीर में घुसने का आरोप लगा। एक अपराधी की तरह उन्हें श्रीनगर की जेल में बंद कर दिया गया।

कुछ वक्त बाद उन्हें दूसरी जेल में शिफ्ट कर दिया गया। कुछ वक्त बाद उनकी बीमारी की खबरें आने लगी। वह गंभीर रुप से बीमार हुए तो उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहां कई दिन तक उनका इलाज किया गया. माना जाता है कि इसी दौरान उन्हें ‘पेनिसिलिन’ नाम की एक दवा का डोज दिया गया। चूंकि इस दवा से मुखर्जी को एलर्जी थी, इसलिए यह उनके लिए हानिकारक साबित हुई। कहते हैं कि डॉक्टर इस बात को जानते थे कि यह दवा उनके लिए जानलेवा है। बावजूद इसके उन्हें यह डोज दिया गया।

धीरे-धीरे उनकी तबियत और खराब होती गई। अंतत: 23 जून 1953 को उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर ली। मुखर्जी की मौत की खबर उनकी मां को पता चली तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने नेहरु से गुहार लगाई कि उनके बेटे की मौत की जांच कराई जाये। उनका मानना था कि उनके बेटे की हत्या हुई है। यह गंभीर मामला था, लेकिन नेहरू ने इसे अनदेखा कर दिया। हालाँकि, कश्मीर में उनके किये इस आन्दोलन का काफी फर्क पड़ा और बदलाव भी हुआ।