दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी मंदिर बना 52वां शक्तिपीठ Danteswari Mandir

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कहते हैं माँ दंतेश्वरी मंदिर का खंभा पकड़ लिया तो मिलगी चाँद सी खूबसूरत दुल्हन –

भारत देश को धार्मिक स्थल के नाम से जाना जाता है क्योंकि भारत में धार्मिक स्थल इतने हैं कि इनकी गिनती नहीं की जा सकती। इनमें से कुछ तो विश्व प्रसिद्ध स्थल है जिन्हें देखने के लिए लोग देश ही नहीं बल्कि विदेशों से आते हैं। भारत को संस्‍कृति और सभ्‍यताओं का देश भी माना जाता है। भारत के मंदिरो में भक्‍त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और उनके आराध्‍य उसे पूरा भी करते हैं। इसी संबंध में आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता होगा।

भारत में श्रद्धालुओं की हर मंदिर के प्रति अलग आस्था और मान्यताएं हैं।  ऐसी ही मान्‍यता एक मंदिर के करामाती खंभे की है जिसके बारे में हम आप को बताने जा रहे हैं। ये करामाती खंभा छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर जिले में स्थित है। वैसे तो आपको देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का ही वर्णन मिलेगा लेकिन कुछ स्थानीय मान्यताएं कोई और ही कहानी बताती है।  दरअसल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी माता मंदिर को 52वां शक्तिपीठ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ माँ सती का दांत गिरा था और इसी वजह से इस इलाके का नाम दंतेवाड़ा पड़ा था।

माता के इस मंदिर को लेकर बहुत सी कहानियां और मान्यताएं प्रसिद्ध हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि माँ के इस मंदिर का निर्माण 14वीं सदी में चालुक्य राजाओं ने दक्षिण भारतीय वास्तुकला से करवाया था। देवी माँ ने छह भुजाओं में दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशूल और बांए हाथ में घटी, पद्घ और राक्षस के बाल धारण किए हुए हैं। माँ दंतेश्वरी मंदिर में देवी माँ के चरण के निशान भी मौजूद हैं। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक गरुड़ स्तंभ है जिसे सभी भक्त पीठ की ओरसे बाहों में भरने की कोशिश करते हैं।

इस खंभे के प्रति मान्यता है कि जिसकी बाँहों में ये खंभा समा गया उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। दंतेवाड़ा देवी दंतेश्वरी को समर्पित है। यहाँ के लोग देवी माँ को अपनी आराध्य देवी मानते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काकतीय वंश के राजा अन्न्म देव और बस्तर राज परिवार की माँ दंतेश्वरी कुल देवी है। मान्यता है कि जब अन्नम देव नाम के राजा देवी माँ के दर्शन करने आये तब देवी दंतेश्वरी ने उन्हें दिया और कहा कि जहाँ तक वो जाएंगे वहां तक देवी उनके साथ चलेगी। साथ ही ये भी कहा कि वही उसका राज्य भी होगा।

लेकिन शर्त ये थी कि राजा को पीछे मुड़कर नहीं देखना था और देवी माँ उनके पीछे-पीछे जहां तक जाती, वहां तक की ज़मीन पर राजा का ही राज हो जाता।  इसके बाद राजा कई दिनों तक बस्तर इलाके में चलता रहा और देवी माँ भी उनके पीछे – पीछे चलती रही। ऐसा कहा जाता है कि जब राजा शंकनी – डंकनी नदी के पास पहुंचे तो जब वे नदी पर कर रहे थे तो उन्हें देवी माँ के पायल की आवाज सुनाई दी तो राजा ने पीछे मुड़कर देख लिया और देवी माँ वही ठहर गयी। इसके बाद राजा ने वहां मदिर का निर्माण करवाकर नियमित पूजा-आराधना शुरु कर दी।